मर्दों की बेलगाम लम्पटता को खुली छूट का ‘पर्व’

Approved by Srinivas on Thu, 04/01/2021 - 18:08

:: श्रीनिवास ::

होली के मौके पर गाये जाने और बजने वाले गीतों को याद कर लें. सारी मर्यादा और महान संस्कृति की धज्जी उड़ाते और स्त्री-पुरुष के बीच के नैसर्गिक संबंधों को फूहड़ ढंग से उजागर करते ये गीत क्या मर्दों के अंदर छिपी गलीज और मूलतः स्त्री विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन नहीं हैं? एक नमूना- ‘..भर फागुन बुढऊ देवर लगिहैं..’ यह कथन लगता तो किसी स्त्री का है, लेकिन दरअसल यह मर्दों का ऐलान है, जो अपने लिए तो सारी छूट चाहता है, पर उसमें स्त्री की इच्छा के प्रति कोई सम्मान नहीं है. महिला या अविवाहित युवती के लिए तो बस देवर या जीजा के साथ कुछ ठिठोली या थोड़ा बहुत स्पर्श-सुख लेने भर की छूट है; मगर मर्द किसी उम्र का हो, खुद को हर युवती या किशोरी का भी देवर बन कर ‘कुछ भी’ कर गुजरने का अधिकार (या कम से कम चाह) रखता है! 

होली के मस्ती भरे माहौल में किसी के रंग में भंग नहीं डालना चाहता था. पर अब जुर्रत कर रहा हूँ. बचपन से होली को इंज्वाय करता रहा हूँ. कुछ हद तक आज भी करता हूँ. मगर बीते अनेक वर्षों से इस नतीजे पर पहुँचता गया हूं कि हम होली की ‘सकारात्मक’ बातों (कि होली में सबकी निजी पहचान मिट जाती है, कि सारे गिले-शिकवे भुला कर, सारे मतभेदों-मनभेदों को परे रख कर सभी एक दूसरे से गले मिलते हैं, कि इस दिन कोई बड़ा या छोटा नहीं, कोई अमीर या गरीब नहीं रहता आदि) पर इतने मुग्ध हैं कि इसके नकारात्मक पक्ष पर या तो हमारी नजर नहीं पड़ती या जानते हुए भी उसकी चर्चा से बचते हैं.

होली के बाद होली पर कुछ विचार

मानता हूँ कि त्यौहार मानव की उत्सव-प्रियता का ही प्रकटीकरण है, कि जीवंत समाज ऐसे पर्वों-त्योहारों से नई ऊर्जा ग्रहण करता है. पत्रकार हर त्यौहार के पहले मंहगाई का रोना रोकर बताते हैं कि इस बार दीवाली या होली फीकी रहेगी. मगर खुश रहना सिर्फ माली हालत पर निर्भर नहीं करता. लोग खुश होने के बहाने ढूंढ़ ही लेते हैं. और निश्चय ही  होली उत्तर भारत में सामूहिक ख़ुशी और उमंग का सबसे शानदार मौका और बहाना है. चूंकि इसकी अच्छाइयों (आम आदमी का त्यौहार, धार्मिक कर्मकांड नहीं के बराबर और वास्तविक अर्थों में पूरे समाज का उत्सव बनने की सम्भावना) को स्वीकार करता हूं, इसलिए यहाँ उनकी चर्चा गैरजरूरी है. मगर काश कि होली के पक्ष में किये जानेवाले सकारात्मक दावे पूरी तरह सच होते. काश कि जातियों, वर्गों और लैंगिक दृष्टि से गैरबराबर हमारा समाज कम से इस एक दिन भी समानता में जी पाता.

सबसे पहले तो यह लगभग मर्दवादी या मर्दों का त्यौहार है. मर्दों की बेलगाम लम्पटता को खुली छूट का ‘पर्व’ है. होली के पहले के कुछ दिनों से यत्र-तत्र-सर्वत्र बजने वाले ‘हिट’ गीतों को याद कीजिये. ‘सिलसिला’ फिल्म का गाना ‘रंग बरसे....खाये गोरी का यार बालम तरसे, रंग बरसे...’ तो मानो होली का ‘नेशनल एंथम’  ही बन गया है. इसे सुनते हुए और झूमते हुए हमारे मन में क्या भाव आता है? अपवादों को छोड़ हम (पुरुष) खुद को उस ‘गोरी’ का यार मान लेते हैं, जिसका ‘बेचारा’ बलम उसे भोगने को तरसता है. कभी खुद को उस 'बलम' की जगह रख कर देखिये; या अपनी पत्नी या प्रेमिका या अपनी बहन में उस गोरी को. 

होली के मौके पर गाये जाने और बजने वाले गीतों को याद कर लें. सारी मर्यादा और महान संस्कृति की धज्जी उड़ाते और स्त्री-पुरुष के बीच के नैसर्गिक संबंधों को फूहड़ ढंग से उजागर करते ये गीत क्या मर्दों के अंदर छिपी गलीज और मूलतः स्त्री विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन नहीं हैं? एक नमूना- ‘..भर फागुन बुढऊ देवर लगिहैं..’ यह कथन लगता तो किसी स्त्री का है, लेकिन दरअसल यह मर्दों का ऐलान है, जो अपने लिए तो सारी छूट चाहता है, पर उसमें स्त्री की इच्छा के प्रति कोई सम्मान नहीं है. महिला या अविवाहित युवती के लिए तो बस देवर या जीजा के साथ कुछ ठिठोली या थोड़ा बहुत स्पर्श-सुख लेने भर की छूट है; मगर मर्द किसी उम्र का हो, खुद को हर युवती या किशोरी का भी देवर बन कर ‘कुछ भी’ कर गुजरने का अधिकार (या कम से कम चाह) रखता है! 

सिनेमा में और टीवी सीरियलों की रंगीन होली को भूल जाइये. वहां तो एक हद तक स्त्री-पुरुष की बराबरी दिखती भी है. पौराणिक या पुरानी फिल्मों में भी शालीन होली ही नजर आती थी. मगर आज की फिल्मों में यदि होली का सीन हुआ, तो कुछ फूहड़ अंदाज में  ही सही, स्त्री भी जम कर मस्ती लेती है. क्या हम अपने घर और मोहल्ले में वैसी होली की कल्पना भी कर सकते हैं? जरा होली के दिन के अपने आसपास के माहौल को याद कीजिये. कितनी लड़कियां या महिलाएं सड़कों पर नजर आती हैं? अपने मोहल्ले में वे भले ही झुण्ड में घूम लें, पर मजाल है कि शहर की मुख्य सड़कों पर या बाजार में निकल जाएँ. कुछ ने यह दुस्साहस कर भी दिया, तो उन्हें  क्या और किस हद तक भुगतना पड़ सकता है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है. और उस दुर्गति और अपमान के लिए भी उन्हें ही जवाबदेह ठहराया जायेगा- ‘किसने कहा था कि होली के दिन सड़क पर निकलो!’

बेशक इसके अपवाद भी हैं. मेरे गांव (फुलवरिया, भागलपुर) की होली अब तक अश्लीलता और फूहड़ता से बची हुई है. मित्रों से सुना है, अपनी  ठेठ 'मर्दवादी’ और ‘लंठ’ पहचान के बावजूद आरा शहर में होली के दिन लड़कियों के झुंड बेखौफ निकलते हैं! और भी ऐसे शहर व गांव होंगे. मगर ये अपवाद ही हैं.

हालांकि मेरे गाँव में भी संवत जलने के समय गाये  जानेवाले गीतों में निहित फूहड़ता के कारण दादी ने हमारे वहां जाने पर रोक लगा रखी थी. फिर बाहर चला गया. जब  गाँव में रहा भी तो उस आयोजन में शामिल नहीं हुआ. उम्र के कारण भी, क्योंकि वह युवकों का कार्यक्रम होता है. और उनमें युवतियों के शामिल होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती. इसी तरह  'प्रतिबंधित' भंग का सेवन  छोटे-बड़े पुरुषों के लिए तो लगभग अपरिहार्य है; पर महिला के लिए निषिद्ध.

और भारतीय संस्कृति के एक प्रमुख केंद्र बनारस के बारे में क्या कहेंगे? प्रसंगवश, बीएचयू में पढ़े हरिवंश जी (राज्यसभा के उप-सभापति, तब वे हमारे सम्पादक हुआ करते थे) से एक बार पूछा था- बनारस में होली के दिन मुख्य चौराहे (शायद गोदौलिया) पर होनेवाले जमावड़े में-जहाँ शहर के तमाम प्रतिष्ठित लोग शामिल होते हैं- में प्रयुक्त भाषा के बारे में जो सुना है, वह कितना सच है? उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था- 'आपने जो सुना होगा, कम सुना होगा.' मुझे शक है कि उस मंच पर और भीड़ में कोई महिला भी होती होगी.

कोई शक नहीं कि यह पूरी प्रकृति के झूमने का मौसम है, जब पेड़-पौधों के साथ ही समस्त जीव-जगत सृजन की कामना और उत्तेजना-उमंग से लबरेज होता है. कह सकते हैं कि होली इस उल्लास और यौवन-आवेग के छलक पड़ने का प्रतीक पर्व है. तभी तो इसे वसंतोत्सव भी कहते हैं, मदनोत्सव भी. कुछ लोग तो इसे ‘वेलेंटाइन डे’ का भारतीय रूप या विकल्प भी कह देते हैं. मगर काश कि यह सच होता.

हम जानते हैं कि इस (श्रृंगार या सेक्स के) मामले में समाज  और परंपरा के तमाम निषेधों की धज्जियाँ उड़ती रहती हैं. मगर हम इस कल्पना से भी कांप उठेंगे कि मेरे घर की कोई महिला या लड़की भी ‘फागुन’ की मस्ती में उस ‘लक्ष्मण रेखा’ को लाँघने का प्रयास कर सकती है; या कर भी चुकी है. और यदि ऐसा कुछ मालूम हो जाये, तो संभव है, परिवार की ‘इज्जत’ बचाने के नाम पर हम चुप लगा जाएँ, मगर ‘भर फागुन..’ वाले गीत का नशा तो उतर ही जायेगा. नहीं?

विपरीत लिंग के प्रति यह आकर्षण प्राकृतिक है, पर यह एकतरफा नहीं हो सकता. मगर लिंग-योनि की पूजा करनेवाला यह देश, ‘कामसूत्र’ के रचयिता का यह देश, मंदिरों में उत्कीर्ण मिथुन मूर्तियों का यह देश, ‘काम’ को जीवन का आवश्यक कर्म माननेवाला यह देश कालांतर में स्त्री विरोधी होता गया. काम या सेक्स मानो वर्जित शब्द हो गये. स्त्री-पुरुष संबंधों पर धर्म, नैतिकता और परंपरा के नाम पर तरह तरह का अवरोध लगा दिये गये. नतीजतन हम पाखंड में जीने लगे, एक पाखंडी समाज बन गये. स्त्री ‘भोग’ की ‘वस्तु’ बन गयी. सारे निषेध उसके हिस्से, मर्दों को खुली छूठ.

दो वर्ष पहले एक होली मिलन समारोह में शामिल होने का मौका मिला. सभी धर्मों और जातियों-वर्णों के लोग सहजता से गले मिले. अच्छा लगा. यह इस देश की साझा संस्कृति का एक जीवंत उदाहरण था. लेकिन समारोह में एक भी महिला नहीं! सिवाय एकाध स्थानीय सफाईकर्मी महिला के. किसी को कहा भी नहीं गया था कि अपनी पत्नी के साथ आयें!

बात सिर्फ इसके स्त्री विरोधी स्वरूप की नहीं है. यह दावा भी पूरी तरह सही नहीं है कि इस दिन समाज का हर तबका उंच-नीच का भेद मिटा कर एक हो जाता है. शहरों में तो फिर भी गनीमत है, मगर जिन गांवों में असली भारत बसता है,  अपवादों को छोड़ कर हर जाति और समुदाय होली में भी अलग थलग ही रहता है. होली गानेवाली उनकी टोली भी अपने ही टोले तक सीमित रहती है. वैसे होली का यह नकारात्मक पक्ष भी असल में समाज का ही बुनियादी दोष है.

फिर भी होली में गैरबराबरी को भूल कर एक होने की संभावना तो है ही. उम्मीद करें कि एक दिन हम सही में अपने तन के साथ मन को भी एक रंग में रंगने में कामयाब होंगे. और तब होली सचमुच समरसता का शानदार पर्व बनेगा, क्योंकि इतनी नकारात्मकता के बावजूद होली आम आदमी का त्यौहार है. चूँकि होली में धार्मिक कर्मकांड नहीं के बराबर होता है, इसलिए यह धार्मिक के बजाय लोक त्यौहार ज्यादा लगता है. मुझे इसकी यही विशेषता अधिक आकर्षित करती तो रही है, मगर इसके स्त्री विरोधी स्वरूप की अनदेखी भी नहीं कर पाता.

आशा है, सुधी जन इसे ‘बुरा ना मानो...’ की स्पिरिट में लेंगे.

About the Author

Srinivas

मूल रूप से समाजकर्मी, फिर पत्रकार रहे श्रीनिवास जी की सम-सामयिक मुद्दों में विशेष रुचि रही है। पत्रकारिता में आने से पहले वह 74' के बिहार (संयुक्त) आंदोलन और जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में सक्रिय थे। पत्रकारिता के आरंभ से अंत तक रांची से प्रकाशित 'प्रभात खबर' की संपादकीय टीम में रहे। 1989 में हरिवंश जी संपादक बने तो संपादकीय पन्ने की जिम्मेवारी इन्हें मिली। सेवानिवृत्ति के बाद लेखन के साथ ही सामाजिक आयोजनों व गतिविधियों में शामिल रहते हैं।

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