एक साथ चुनाव : अव्यावहारिक, अलोकतांत्रिक और बेतुका सुझाव

Approved by Srinivas on Tue, 07/09/2019 - 20:29

:: श्रीनिवास ::

संविधान में इसके प्रावधान नहीं हैं, यह कोई कठिन समस्या नहीं है। संसद चाहे, तो इसके लिए संविधान संशोधन किये जा सकते हैं। मगर ऐसा करना जरूरी क्यों है; और क्या इससे भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा? मेरा मानना है कि न तो यह जरूरी है, न ही इसका कोई लाभ होगा। जिन राज्यों के चुनाव में कुछ महीनों का अंतर है, उनकी विधानसभाओं को थोड़ा पहले भंग कर या कुछ का कार्यकाल कुछ आगे बढ़ा कर उनके चुनाव लोकसभा के साथ तो कराये जा सकते हैं। लेकिन हर हाल में केंद्र व राज्यों के चुनाव एक साथ ही हों, यह नाहक और नासमझ जिद के अलावा और कुछ नहीं है।

केंद्र में दोबारा ताजपोशी के बाद ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी और भाजपा की नजर में देश  की सारी समस्याएं सुलझ गयी हैं; या फिर गौण हो गयी हैं। उनके लिए सबसे अहम् मुद्दा ‘एक देश, एक चुनाव’ हो गया है। जाहिर है, मीडिया और तमाम चैनलों के लिए भी यही मुद्दा प्रमुख हो गया है। और कमाल यह कि इसके औचित्य, इसकी जरूरत और व्यावहारिकता पर गंभीरता से विचार करने के बजाय इसके पक्ष में सबसे प्रमुख तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे लोकसभा व राज्यों के अलग अलग और बीच बीच में मध्यावधि चुनाव पर होने वाला अकूत खर्च बचेगा। 

इसके पहले भी, वर्ष ’17 में नीति आयोग ने इस सुझाव को उछाला था। जाहिर है, श्री मोदी की प्रेरणा से ही। तब देश में इस गंभीरता से नहीं लिया। यानी न यह सुझाव नया है, न ही इसके पक्ष में कोई नया तर्क सामने आया है। इसलिए इस बार ‘खर्च’ कम होने पर ही जोर दिया जा रहा है।

बहरहाल, इस मुद्दे पर विचार तो किया ही जाना चाहिए। सुनने और सोचने में तो यह बहुत अच्छा लगता है, लेकिन लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करने का विचार/सुझाव पूरी तरह अव्यावहारिक और अलोकतांत्रिक है। यदि ऐसा किया गया, तो इसका मतलब यह होगा कि किसी राज्य की गठबंधन सरकार के किसी घटक के अलग हो जाने या एक दल का बहुमत होने पर भी सत्तारूढ़ दल में टूट हो जाने पर यदि सरकार अल्पमत में आ गयी, तब ‘एक साथ’ चुनाव के नाम पर यानी अगले ‘इकट्ठे’ चुनाव तक अल्पमत सरकार शासन करती रहेगी; या फिर वहां केन्द्रीय शासन लगा दिया जायेगा। क्या यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल होगा?

और यदि केंद्र सरकार ही अल्पमत में आ जाये तो? केंद्र में राष्ट्रपति शासन का कोई प्रावधान तो है नहीं। तो क्या वही अल्पमत सरकार अगले चुनाव तक कायम रहेगी? किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करते समय विपक्ष को ‘वैकल्पिक सरकार कैसे बनेगी’, यह बताना होगा, जैसा तर्क भी बेतुका ही है। मान लीजिये, विपक्षी दलों में ऐसी एकता नहीं है कि वे मिल कर सरकार बना सकें, तब भी क्या एक अल्पमत सरकार का शासन चलता रहेगा? संसद में बिना बहुमत के वह सरकार काम कैसे करेगी? कोई विधेयक कैसे पारित करायेगी? क्या यह प्रावधान कर दिया जायेगा कि सरकार को कोई नया कानून बनाने, बजट पारित कराने के लिए बहुमत की जरूरत ही नहीं है? फिर लोकतंत्र की अहम् शर्त ‘बहुमत का शासन’ का क्या होगा?     

संविधान में इसके प्रावधान नहीं हैं, यह कोई कठिन समस्या नहीं है। संसद चाहे, तो इसके लिए संविधान संशोधन किये जा सकते हैं। मगर ऐसा करना जरूरी क्यों है; और क्या इससे भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा? मेरा मानना है कि न तो यह जरूरी है, न ही इसका कोई लाभ होगा। जिन राज्यों के चुनाव में कुछ महीनों का अंतर है, उनकी विधानसभाओं को थोड़ा पहले भंग कर या कुछ का कार्यकाल कुछ आगे बढ़ा कर उनके चुनाव लोकसभा के साथ तो कराये जा सकते हैं। लेकिन हर हाल में केंद्र व राज्यों के चुनाव एक साथ ही हों, यह नाहक और नासमझ जिद के अलावा और कुछ नहीं है।

एक पक्ष व्यावहारिकता का भी है। मुझे याद है, ’77 का लोकसभा चुनाव तीन चरणों में, महज पांच दिनों के अंदर- 16, 18 और 20 मार्च को- करा लिये गये थे। आज एक बड़े राज्य का चुनाव करने में तीन से चार माह तक का समय लग जाता है। कहा जा रहा है कि सुरक्षा कारणों और चुनाव आयोग के पास संसाधनों की कमी का कारण। ऐसे में पूरे देश में- लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करना कितना व्यावहारिक और संभव होगा, यह भी विचारणीय है। हालांकि ‘एक साथ’ चुनाव के खिलाफ मेरे हिसाब से यह बहुत मजबूत तर्क नहीं है। असहमति के कारण ऊपर दिए जा चुके हैं।

इसके पक्ष में दिया जा रहा यह ‘जोरदार’ तर्क कि इससे अलग अलग चुनाव कराने से होनेवाला खर्च बचेगा, तो एकदम बेतुका है। लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी कवायद-चुनाव पर होनेवाले खर्च को ही आप फिजूलखर्ची कह रहे हैं, हद है! 

वैसे इस समस्या का एक बहुत आसान उपाय है। यह कि संसद और विधानसभाओं का कार्यकाल बीस या तीस वर्ष कर दिया जाये। चुनाव का झंझट ही ख़त्म। कैसा रहेगा? 

(यह आलेख करीब एक साल पहले लिखा गया था, जो अचानक फिर से प्रासंगिक हो गया है। अभी इसे थोड़ा सम्पादित और संशोधित भर कर दिया है)

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