कोरोना पर भारत सरकार के रवैये से खिन्‍न दुनिया भर के 187 बुद्धिजीवियों ने अब विपक्षी दलों को ऐक्‍शन में आने का आव्‍हान किया

:: न्‍यूज मेल डेस्‍क ::

नई दिल्लीः क्‍या दुनिया भर के बुद्धिजीवी भी अब मान बैठे हैं कि भारत की मोदी सरकार किसी भी सकारात्‍मक सुझावों को तवज्‍जोह देने के लिए तैयार नहीं हैं? शायद यही कारण है कि दुनियाभर के 187 प्रख्यात बुद्धिजीवियों ने भारत की विपक्षी पार्टियों को एक पत्र लिखकर कोरोना महामारी से पैदा हुई स्थिति से निपटने के लिए निर्णायक कदम उठाने का आग्रह किया है. इसे खुला पत्र में कहा गया है कि भारत के चुने हुए बुद्धिजीवियों एवं राजनीतिक दलों ने बार-बार भारत सरकार को कोरोना से लड़ने के सुझाव के साथ सहभागिता देने का प्रस्‍ताव दिया। लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार इस सर्वनाशकारी मानव त्रासदी में भी ऐसे सुझावों का स्‍वागत करने की बजाय अनदेखा किया। भारत के विपक्षी दलों को लिखे गए इस पत्र में कहा गया है- ' हम भारत के संबद्ध नागरिकों और शुभचिंतकों का एक समूह कोरोना महामारी से पैदा हुई स्थिति से निपटने के लिए प्रगतिशील विपक्षी पार्टियों द्वारा 12 मई 2021 को भारत सरकार को सुझाए गए निर्णायक उपायों की सरहाना करता है और उनका पूरी तरह से समर्थन करता है.’ इस पत्र के प्रेषक के तौर पर हस्‍ताक्षर करनेवालों में दुनिया भर से शिक्षाविद, मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, लेखक, फिल्मकार और कई अन्‍य पेशेवर शामिल हैं। 

पत्र में दो टूक लहजे में कहा गया है, ‘भारत में यह मानव त्रासदी दिए गए सुझावों पर सरकार द्वारा किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं करने से बढ़ी है.’

पत्र में कहा गया कि यह सुखद है कि इस अप्रत्याशित संकट की घड़ी में अधिकतर राजनीतिक दल लोगों के हित में निष्पक्ष तरीके से काम करने को तैयार हैं. फिर भी केंद्र सरकार के साथ काम करने या सहयोग करने की पेशकश के बावजूद यह चौंकाने वाला है कि भारत सरकार ने न तो इन सुझावों का स्वागत किया है और न ही भारत के समक्ष खड़ी इस स्थिति से निपटने के लिए सभी दलों  राज्य सरकारों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज सहित सभी को साथ लेकर राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया है.

आगे कहा गया, ‘विपक्ष के सहयोग करने की पहल की भारत सरकार द्वारा अवहेलना करने से भारत के अनुभव और विशेषज्ञता को झटका लगा है. परिणामस्वरूप लाखों भारतीय बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं जैसे अस्पताल के वेंटिलेटर, ऑक्सीजन, आवश्यक दवाएं, एंबुलेंस जैसे बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने से जूझ रहा है.’

पत्र में देश में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान सड़कों पर मृतकों और नदियों में शवों के तैरने का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन घटनाओं की तस्वीरों ने दुनिया के मन को झकझोर दिया है.

बुद्धिजीवियों ने कहा कि यह देखना सुखद है कि महामारी के बीच ज्यादातर पार्टियां लोगों के हित में दल की सीमा से परे जाकर काम करने को इच्छुक हैं. ऐसे में यह स्थिति विशेष रूप से चौंकाने वाली है क्योंकि हम सभी को उम्मीद थी कि भारत सरकार इस संकट से दृढ़ता से निपटेगी. कोरोना से निपटने के लिए संसाधनों का विस्तार करने के बजाए ऐसा लगता है कि सरकार अपनी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुकर गई है. यह काफी दुखद है कि पिछले 70 सालों में सफल सामूहिक वैक्सीन अभियानों के इतिहास के बावजूद भारत सरकार ने अलग-अलग और अधिक दरों पर राज्य सरकारों से टीकों को आउटसोर्स किया.’

इसी तरह विशेषज्ञों की सलाह को बार-बार नजरअंदाज किया गया जबकि अस्पष्ट, अप्रमाणित तरीकों को प्रोत्साहित किया गया. बड़ी रैलियां और धार्मिक सभाएं आयोजित की गईं और ऑक्सीजन, वैक्सीन और बिस्तरों की उपलब्धता बढ़ाने की कोई तैयारी नहीं की गई.

पत्र में कहा गया, ‘सरकार ने नागरिकों पर अनावश्यक बोझ डाला, वह भी ऐसे समय पर जब स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया. इसी तरह विदेशों से आ रही राहत सामग्री नौकरशाही देरी की वजह से अक्सर अटक जाती है, जबकि इन्हें तुरंत राज्यों को आवंटित किया जाना चाहिए. इसके साथ ही गैर कोविड संबंधी गतिविधियों में फंड का दुरुपोयग किया जा रहा है. सबसे अधिक परेशान करने वाली बात यह है कि इस अराजकता के बीच स्थिति की गंभीरता को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है जबकि सरकारें पत्रकारों और नागरिकों को सच बोलने के लिए प्रताड़ित कर रही हैं. चौंकाने वाली बात है कि सेंट्रल विस्टा और प्रधानमंत्री के लिए नए आवास जैसी अनावश्यक परियोजनाओं पर अरबं डॉलर खर्च किए जा रहे हैं.एक भी दिन ऐसा नहीं जाता.’

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में जेएनयू की प्रोफेसर एमिरेट्स रोमिला थापर, इतिहासकार इरफान हबीब, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के निदेशक हर्ष मंदर, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी की निदेशक मृदुला मुखर्जी, विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बासु, एमकेएसएस की संस्थापक अरुणा रॉय, इतिहासकार एवं जेएनयू के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व डीन आदित्य मुखर्जी, मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन, एमनेस्टी इंटरनेशनल के पूर्व महासचिव सलिल शेट्टी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव थोराट, यूपीएससी के पूर्व सदस्य पुरुषोत्तम अग्रवाल और जेएनयू, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ सियेना (इटली), यूनिवर्सिटी ऑफ साउ पाउलो, यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के कई शिक्षक शामिल हैं. यह रिपोर्ट द वायर से साभार है। 

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